मेरे शहर का लाजपत नगर
कुछ दिनों से लगातार चर्चा में आ रहे दिल्ली के लाजपत नगर में दुकानों की सीलिंग का मामला लगातार गर्माता जा रहा है , सुप्रीम कोर्ट के द्वारा मास्टर प्लान की अनदेखी कर किए गए निर्माणों के सम्बन्ध में आदेश जारी किया गया जिसके अनुपालन में दक्षिण दिल्ली नगर निगम द्वारा सीलिंग की कार्यवाही की जा रही है जिसका व्यापारियों द्वारा पुरजोर विरोध किया जा रहा है , प्रत्येक व्यक्ति का इसपर अपना नजरिया है कुछ लोगो का मानना है की नोटबंदी और जी.एस टी की मार के बाद मंदी के दौर से गुजर रहे कपडा व्यापारियों के लिए दुकानों की सीलिंग धंधा पूरी तरह चौपट होने के सामान है तो कुछ महानुभावो का मानना है की समुचित विकास के लिए मास्टर प्लान का क्रियान्वयन अत्यंत आवश्यक है।
बहरहाल मसला यहाँ सिर्फ यह नहीं की लाजपत नगर के व्यापारियों का क्या होगा वरन यह की क्या यह समस्या सिर्फ दिल्ली या दिल्ली जैसे बड़े शहरों तक ही सीमित है या आने वाले समय में ऐसी कई परिस्थितियों का सामना सरकार को करना पड़ सकता है।
यदि भोपाल के सन्दर्भ में देखा जाए तो वर्तमान मास्टर प्लान के अनुरूप यहां के न जाने कितने निर्माण अवैध और अयोग्य घोषित किए जा सकते है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण अरेरा कॉलोनी के मुख्या मार्गो पर रहवासी इलाके में चलाई जा रही व्यावसायिक गतिविधियां है , प्रशासनिक बैठकों में जिसकी चर्चा समय समय पर की जाती रही है पर किसी ठोस विकल्प की तलाश अभी तक पूरी नहीं हो सकी है। हर वो शहर जो प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है वहां किसी न किसी इलाके के साथ इस समस्या को जोड़कर देखा जा सकता है परन्तु क्या हमारे पास इस समस्या का कोई हल मौजूद है या हम समस्या से ही अनभिज्ञ है।
हर व्यक्ति रोजगार चाहता है , नौकरियों और साधन- संसाधनों का आभाव व्यक्ति को छोटे व्यापर की ओर आकर्षित करते है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भी यही मानना था की जबतक कुटीर और गृह उद्योग को इस देश में उचित स्थान नहीं मिलेगा भारत की अर्थव्यवस्था को सृदढ़ बनाना केवल एक स्वप्न मात्र है।
हमारे देश में आज भी कुटीर और गृह उद्योग की परिभाषा संकुचित है केवल साबुन, तेल, अचार, पापड़, या अगरबत्ती को ही कुटीर उद्योग का दर्जा मिले यह बेमानी है
हर वह व्यवसाय जो जेब में पड़े चार पैसे और दिल में सहेज कर रखी हिम्मत के साथ किया जा सके कुटीर उद्योग है पर वर्तमान परिस्तिथियों में यदि कोई व्यवसाय करने का मन बनाए तो उसके लिए आवश्यक निवेश और शासकीय अनुज्ञा इंसान की हिम्मत तोड़ देती है।
समय बदल रहा है आज एक गृहणी द्वारा किया जा रहा कस्टमाइज़्ड गिफ्ट्स का काम भी गृह उद्योग है और एक स्कूल या कॉलेज स्टूडेंट के द्वारा मोबाइल एप्लीकेशन का डेवलपमेंट भी , आज इज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस में भारत की रैंकिंग भले ही सुधरी हो परन्तु इस स्वप्न को धरातल पर लाने के लिए सरकार को कई कदम उठाने होंगे जिसके लिए इस समस्या के मूल की पहचान आवश्यक है
रियल एस्टेट सेक्टर में काले धन के कारण हुई ज़मीन के दामों में हुई अनुचित बढ़ोत्तरी ने निर्माण के लिए आवश्यक भूमि और उसकी अफ्फोर्डेबिलिटी में गहरा अंतर पैदा कर दिया है जिसकी वजह से नियमो को ताक पर रखकर निर्माण किए जा रहे है, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा की निर्माण नियमो में समय समय पर जरुरी बदलाव किए जाए साथ ही यह भी देखना होगा की जो सिस्टेमेटिक कमर्शियल जोन अथवा इंडस्ट्रियल पार्क सरकार द्वारा विकसित किए जा रहे है वो केवल उच्चस्तरीय निवेशकों या राजनेताओ तक सीमित न रहे बल्कि मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय उद्यमियो की भागीदारी पर भी ध्यान दिया जाए।
आज लाजपत नगर के ८०० (आठ सौ ) से ज्यादा व्यापारी अपने जीवन भर के कठोर परिश्रम से खड़े किए व्यवसाय से वंचित होने की कागार पर है, कोई भी योजना उन्हें वर्तमान स्तिथि के सामान पुन:स्थापित नहीं कर सकती। कोई भी नियम लोगो से बढ़कर नहीं होता , नियम लोगो को सुव्यवथित ढंग से जीवनयापन करने में सहायक होते है परन्तु जब वही नियम एक बड़े तबके को संकट की स्तिथि में डाल दे तो उसपर पुनर्विचार होना चाहिए और किसी ठोस विकल्प की तलाश की जानी चाहिए साथ ही इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए की भविष्य में ऐसी परिस्तिथि निर्मित न हो।
मेरे शहर में भी कुछ लाजपत नगर पनप रहे है शायद आपके शहर में भी हो, हम केवल आशा कर सकते है की समय रहते समस्याओ को दूर किया जा सकेगा और सभी के उज्जवल भविष्य की कामना कर सकते है की जिस संकट की परिस्तिथि में आज लाजपत नगर के व्यापारी है किसी और को उसका सामना न करना पड़े।
बहरहाल मसला यहाँ सिर्फ यह नहीं की लाजपत नगर के व्यापारियों का क्या होगा वरन यह की क्या यह समस्या सिर्फ दिल्ली या दिल्ली जैसे बड़े शहरों तक ही सीमित है या आने वाले समय में ऐसी कई परिस्थितियों का सामना सरकार को करना पड़ सकता है।
यदि भोपाल के सन्दर्भ में देखा जाए तो वर्तमान मास्टर प्लान के अनुरूप यहां के न जाने कितने निर्माण अवैध और अयोग्य घोषित किए जा सकते है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण अरेरा कॉलोनी के मुख्या मार्गो पर रहवासी इलाके में चलाई जा रही व्यावसायिक गतिविधियां है , प्रशासनिक बैठकों में जिसकी चर्चा समय समय पर की जाती रही है पर किसी ठोस विकल्प की तलाश अभी तक पूरी नहीं हो सकी है। हर वो शहर जो प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है वहां किसी न किसी इलाके के साथ इस समस्या को जोड़कर देखा जा सकता है परन्तु क्या हमारे पास इस समस्या का कोई हल मौजूद है या हम समस्या से ही अनभिज्ञ है।
हर व्यक्ति रोजगार चाहता है , नौकरियों और साधन- संसाधनों का आभाव व्यक्ति को छोटे व्यापर की ओर आकर्षित करते है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भी यही मानना था की जबतक कुटीर और गृह उद्योग को इस देश में उचित स्थान नहीं मिलेगा भारत की अर्थव्यवस्था को सृदढ़ बनाना केवल एक स्वप्न मात्र है।
हमारे देश में आज भी कुटीर और गृह उद्योग की परिभाषा संकुचित है केवल साबुन, तेल, अचार, पापड़, या अगरबत्ती को ही कुटीर उद्योग का दर्जा मिले यह बेमानी है
हर वह व्यवसाय जो जेब में पड़े चार पैसे और दिल में सहेज कर रखी हिम्मत के साथ किया जा सके कुटीर उद्योग है पर वर्तमान परिस्तिथियों में यदि कोई व्यवसाय करने का मन बनाए तो उसके लिए आवश्यक निवेश और शासकीय अनुज्ञा इंसान की हिम्मत तोड़ देती है।
समय बदल रहा है आज एक गृहणी द्वारा किया जा रहा कस्टमाइज़्ड गिफ्ट्स का काम भी गृह उद्योग है और एक स्कूल या कॉलेज स्टूडेंट के द्वारा मोबाइल एप्लीकेशन का डेवलपमेंट भी , आज इज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस में भारत की रैंकिंग भले ही सुधरी हो परन्तु इस स्वप्न को धरातल पर लाने के लिए सरकार को कई कदम उठाने होंगे जिसके लिए इस समस्या के मूल की पहचान आवश्यक है
रियल एस्टेट सेक्टर में काले धन के कारण हुई ज़मीन के दामों में हुई अनुचित बढ़ोत्तरी ने निर्माण के लिए आवश्यक भूमि और उसकी अफ्फोर्डेबिलिटी में गहरा अंतर पैदा कर दिया है जिसकी वजह से नियमो को ताक पर रखकर निर्माण किए जा रहे है, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा की निर्माण नियमो में समय समय पर जरुरी बदलाव किए जाए साथ ही यह भी देखना होगा की जो सिस्टेमेटिक कमर्शियल जोन अथवा इंडस्ट्रियल पार्क सरकार द्वारा विकसित किए जा रहे है वो केवल उच्चस्तरीय निवेशकों या राजनेताओ तक सीमित न रहे बल्कि मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय उद्यमियो की भागीदारी पर भी ध्यान दिया जाए।
आज लाजपत नगर के ८०० (आठ सौ ) से ज्यादा व्यापारी अपने जीवन भर के कठोर परिश्रम से खड़े किए व्यवसाय से वंचित होने की कागार पर है, कोई भी योजना उन्हें वर्तमान स्तिथि के सामान पुन:स्थापित नहीं कर सकती। कोई भी नियम लोगो से बढ़कर नहीं होता , नियम लोगो को सुव्यवथित ढंग से जीवनयापन करने में सहायक होते है परन्तु जब वही नियम एक बड़े तबके को संकट की स्तिथि में डाल दे तो उसपर पुनर्विचार होना चाहिए और किसी ठोस विकल्प की तलाश की जानी चाहिए साथ ही इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए की भविष्य में ऐसी परिस्तिथि निर्मित न हो।
मेरे शहर में भी कुछ लाजपत नगर पनप रहे है शायद आपके शहर में भी हो, हम केवल आशा कर सकते है की समय रहते समस्याओ को दूर किया जा सकेगा और सभी के उज्जवल भविष्य की कामना कर सकते है की जिस संकट की परिस्तिथि में आज लाजपत नगर के व्यापारी है किसी और को उसका सामना न करना पड़े।
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